भक्ति को मजबूत बनाने के लिए कुसंग का त्याग अनिवार्य है : भक्ति को शक्तिशाली और स्थिर बनाने के लिए कुसंग का त्याग बेहद आवश्यक है। Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj के सत्संग से जानें कि संग का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और सत्संग कैसे जीवन बदल देता है।
भक्ति मार्ग को सरल, पवित्र और प्रभावशाली बनाने के लिए सद्गुरु हमेशा एक ही बात पर ज़ोर देते हैं— कुसंग का त्याग। श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज भी अक्सर अपने प्रवचनों में बताते हैं कि सच्ची भक्ति तभी फल देती है, जब मन और संग दोनों शुद्ध हों। भक्ति की जड़ें मन में होती हैं, और मन उसी दिशा में चलता है जहां हमारा संग होता है। इसलिए कुसंग का प्रभाव भक्ति की यात्रा को कमजोर कर सकता है।
कुसंग क्या है?

‘कुसंग’ का सीधा अर्थ है—ऐसा संग जो हमारे मन, कर्म और चरित्र को कमजोर करे।
जैसे—
नकारात्मक सोच वाले लोग
ईश्वर, भक्ति या नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले
व्यसनों में लगे लोग
लालच, क्रोध, अहंकार को बढ़ावा देने वाला संग
शास्त्र कहते हैं—
“संगत का असर मन पर तुरंत लगता है।”
जैसे लोहे को आग के पास रखने से वह लाल हो जाता है, वैसे ही मन जिस संग में रहता है, उसी रंग में रंग जाता है।
भक्ति में कुसंग त्याग क्यों आवश्यक है?

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज बताते हैं कि भक्ति एक सूक्ष्म और शुद्ध साधना है। यह मन की पवित्रता पर आधारित है।
कुसंग के कारण—
मन अशुद्ध होने लगता है
भक्ति में रस कम होने लगता है
मन प्रभु की ओर से हटकर संसार में भटकने लगता है
आलस्य, संशय और मोह बढ़ने लगता है
नाम-जप में चंचलता आ जाती है
कुसंग उस धूल की तरह है जो रोज़-रोज़ मन पर चिपकती रहती है और धीरे-धीरे भक्ति के प्रकाश को ढक देती है।
कुसंग का त्याग, सत्संग का योग

भक्ति कैसे मजबूत करें?
जहाँ कुसंग भक्ति को कमजोर करता है, वहीं सत्संग भक्ति को पुष्ट, उज्ज्वल और स्थिर बनाता है।
सत्संग के लाभ—
मन शांति पाता है
भक्ति का मार्ग स्पष्ट होता है
नाम-जप में प्रगाढ़ता आती है
अच्छे संस्कारों का विकास होता है
सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है
सत्संग मन में वह शक्ति उत्पन्न करता है, जो कुसंग की आदतों को भी बदलने में मदद करती है।
कुसंग से बचने के व्यावहारिक उपाय
कुसंग से बचने के व्यावहारिक उपाय

1. अपनी संगत की समीक्षा करें
सोचें कि किन लोगों से आपका मन विचलित होता है और किनसे शांति मिलती है।
2. नकारात्मक परिवेश से दूरी बनाएं
चाहे टीवी, सोशल मीडिया, या वास्तविक लोग—जो मन में नकारात्मकता भरें, उनसे दूरी आवश्यक है।
3. नाम-स्मरण और जप बढ़ाएं
जब मन में राम-नाम का स्मरण रहता है, तो कुसंग का प्रभाव स्वतः कम हो जाता है।
4. सत्संग सुनने की आदत बनाएं
प्रतिदिन 15–20 मिनट संत-महात्माओं के प्रवचन सुनें।
5. पवित्र ग्रंथों का अध्ययन
श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस, गीता जैसी पुस्तकों का पाठ मन को स्थिर और निर्मल बनाता है।
श्री हित प्रेमानंद जी महाराज का संदेश
महाराज जी कहते हैं—
“भक्ति का बीज तभी पनपेगा जब उसे सही मिट्टी और सही वातावरण मिलेगा। कुसंग वह विष है जो भक्ति के पौधे को सूखा देता है। इसलिए पहले कुसंग त्यागो, फिर प्रेम से नाम जपो।”
उनकी वाणी मन को यह समझाती है कि भक्ति कोई बाहरी साधना नहीं, बल्कि मन की अवस्था है। और मन के परिवर्तन के लिए सही संग ही सबसे बड़ा आधार है।
सार बात
भक्ति केवल पूजा, पाठ या माला जपने का नाम नहीं है, बल्कि वह दिव्यता है जो जीवन को शांति, प्रेम और आनंद से भर देती है। यदि हम भक्ति को स्थिर और प्रभावशाली बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहला कदम होगा— कुसंग का त्याग और दूसरा— सत्संग का सेवन।
जब मन सही संग अपनाता है, तो भक्ति अपने आप फलने-फूलने लगती है और प्रभु की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।
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