Shri Premanand Ji Maharaj : मोक्ष क्या है? कैसे पता चले कि अब दोबारा जन्म नहीं होगा? शास्त्रों और महापुरुषों के अनुसार मोक्ष के वास्तविक लक्षण जानें—मान–अपमान में समानता, सुख–दुःख में समभाव, कामनाओं का अंत और जीवनमुक्ति के संकेत।

मोक्ष के लक्षण: कैसे पता चले कि जीवन में अब दोबारा जन्म नहीं होगा? | भगवत प्राप्ति के संकेत
मोक्ष ऐसा दिव्य लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति के बाद आत्मा को किसी भी योनि में भटकना नहीं पड़ता। जैसे बुखार उतरने पर थर्मामीटर तुरंत बता देता है कि तापमान सामान्य है, वैसे ही शास्त्रों में भी कुछ ऐसे “लक्षण” बताए गए हैं जो यह प्रमाण देते हैं कि व्यक्ति जीवनमुक्त हो चुका है या मोक्ष-मार्ग पर अटल रूप से स्थापित हो चुका है।
यह लेख उन्हीं गूढ़ आध्यात्मिक संकेतों का सरल भावार्थ है, जो महान संतों, विशेषकर श्री प्रेमानंद जी महाराज जैसे महापुरुषों के उपदेशों से मिलता है।
मोक्ष क्या है? (What is Moksha)

मोक्ष का अर्थ है — जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति। जब आत्मा अपनी मूल अवस्था में स्थित हो जाती है, जहां कोई वासना, कोई बंधन, कोई भय, कोई मोह नहीं रहता— वही मोक्ष है।
शास्त्र कहते हैं:
“जिसका चित्त भगवद् भक्ति में स्थिर हो जाए, और सारे द्वंद्व समाप्त हो जाएँ, वही जीवनमुक्त है।”
1. मान–अपमान में समान भाव रखना (Equanimity in Respect and Insult)
सच्चे महापुरुष पर मान और अपमान का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
कोई उनकी पूजा करे — वे शांत रहते हैं
कोई अपमान करे या कठोर वचन बोले — तब भी वे भीतर से अप्रभावित रहते हैं
यह अवस्था साधारण मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन है, पर यही मोक्ष की सबसे प्रमुख पहचान है।
भगवद्गीता भी कहती है:
“सम्मान-असम्मान में जो समान रहे, वही स्थिरप्रज्ञ है।”
2. मोह और कामनाओं का पूर्ण त्याग (Freedom from Desires & Attachment)
जो व्यक्ति भगवत-प्राप्ति के धाम पर स्थापित हो जाते हैं, उनमें किसी भी प्रकार की लौकिक कामना नहीं रहती।
न किसी व्यक्ति के प्रति मोह
न धन, प्रतिष्ठा, संबंधों का आकर्षण
न किसी लाभ की इच्छा
उनका चित्त केवल भगवान में स्थित रहता है — निर्लिप्त, निर्मल, निर्विकल्प।
3. संग-दोष का प्रभाव समाप्त (No effect of Good or Bad Company)
साधारण मनुष्य पर संग (संगति) का प्रभाव तुरंत होता है—
अच्छा संग उठाता है, बुरा संग गिराता है।
परंतु महापुरुषों पर किसी भी तरह का संग-दोष नहीं लगता।
वे भीड़ में बैठें या अकेले, शहर में रहें या जंगल में—
उनका मन भगवान में ही स्थित रहता है।
यह भी जीवनमुक्ति का महत्वपूर्ण लक्षण है।
4. सुख-दुःख में समभाव (Balance in Joy and Sorrow)
जिस आत्मा ने मोक्ष को स्पर्श कर लिया है, वह सुख और दुःख दोनों को समान दृष्टि से देखती है।
सुख मिले — शांत
दुख मिले — फिर भी शांत
सुख आने पर अहंकार नहीं, दुःख आने पर हाहाकार नहीं।
यह स्थिरता दर्शाती है कि आत्मा द्वंद्वातीत हो चुकी है।
5. लाभ-हानि, जय-पराजय में समता (Equanimity Amid Gains & Losses)
मोक्ष-मार्ग पर स्थित व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता।
लाभ हुआ — ठीक
हानि हुई — ठीक
जीत मिली — ठीक
हार मिली — फिर भी ठीक
क्योंकि उसका सुख बाहरी चीजों पर निर्भर नहीं रहता।
उसका सुख भगवान में, नाम में और आत्मिक शांति में स्थित हो जाता है।
6. समाज में रहकर भी भगवान में स्थित (Living in the World but Detached)

महापुरुष व्यापार करें, सेवा करें, समाज में रहें या परिवार में उनका मन अंदर से निरंतर भगवान में ही लीन रहता है।बाहर से वे सामान्य मनुष्य जैसे लग सकते हैं,
पर भीतर वे निरंतर ईश्वर से एकरस रहते हैं।
मोक्ष की अंतिम पहचान: भगवत-साक्षात्कार की योग्यता
शास्त्र कहता है:
“सुख-दुःख में समभाव रखने वाला, द्वंद्वों से रहित व्यक्ति परमपद का अधिकारी होता है।”
जब मनुष्य इन गुणों को धारण कर लेता है,
तब उसका जन्म-मरण समाप्त हो जाता है।
वह ईश्वर-साक्षात्कार के योग्य हो जाता है।
क्या ये स्थिति कठिन है?
हाँ। पर असंभव नहीं। नियमित नामजप, सत्संग, सेवा और भगवत-स्मरण मनुष्य को धीरे-धीरे इस अवस्था तक पहुँचा सकते हैं।
निष्कर्ष
मोक्ष कोई कल्पना नहीं—यह जीवन में जीकर प्राप्त होने वाला अद्भुत अनुभव है।
जब मनुष्य
मान-अपमान
सुख-दुःख
लाभ-हानि
मोह-कामना
सभी में समभाव रखे —
तभी वह जीवनमुक्त कहलाता है।
भगवान का नाम, उनकी कृपा और महापुरुषों का मार्गदर्शन
मनुष्य को इस अवस्था की ओर ले जाता है।

⭐ FAQs
Q1. मोक्ष के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
मोक्ष के लक्षणों में मान–अपमान, सुख–दुःख, लाभ–हानि और जय–पराजय में समान भाव रखना शामिल है। एक जीवनमुक्त व्यक्ति किसी भी परिस्थिति से प्रभावित नहीं होता।
Q2. क्या मोक्ष प्राप्त व्यक्ति पर संग-दोष का असर होता है?
नहीं। महापुरुषों पर किसी भी प्रकार का संग-दोष या वातावरण का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। उनका चित्त सदैव भगवान में स्थित रहता है।
Q3. क्या कामनाओं का समाप्त होना भी मोक्ष का संकेत है?
हाँ। जब मनुष्य में सभी लौकिक कामनाओं का अंत हो जाता है, वही मोक्ष की सबसे बड़ी पहचान है।
Q4. जीवनमुक्ति और मोक्ष में क्या अंतर है?
जीवनमुक्ति वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति जीवित रहते हुए भी संसार से निर्लिप्त रहता है। मोक्ष वह अंतिम अवस्था है जब जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
Q5. क्या मोक्ष प्राप्त करना कठिन है?
कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। नियमित नाम-जप, सत्संग, सेवा और भगवान का स्मरण मनुष्य को धीरे-धीरे मोक्ष के मार्ग पर स्थापित करते हैं।
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