क्या गुरु को भगवान मानने से भगवान नाराज़ होते हैं? क्या बताया Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj ने

Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj का दिव्य उत्तर:
आध्यात्मिक जीवन में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या गुरु को भगवान मानने से भगवान नाराज़ हो सकते हैं? क्या यह सही भाव है या अति-भक्ति?
इस पर Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj ने अत्यंत गूढ़ और सरल शब्दों में दिव्य समाधान दिया है।

भगवान होते हैं नाराज़?— महाराज जी का उत्तर

Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj कहते हैं कि गुरु ही भगवान हैं और भगवान ही गुरु हैं।
भगवान अलग नहीं, वही प्रेमरूप, दयारूप होकर गुरु के रूप में प्रकट होते हैं।

“बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि”
अर्थात— जो हरि हैं वही हमारे कल्याण हेतु नररूप गुरु का स्वरूप धारण करते हैं।

इसलिए गुरु में भगवान की बुद्धि करना ही सर्वोत्तम भाव है।
गुरु को साक्षात भगवान मानकर चलने वाले साधकों पर विशेष दैवी कृपा बरसती है।

भगवान नाराज़ नहीं होते, बल्कि ऐसे भक्तों पर और प्रसन्न होते हैं।

शास्त्र भी गुरु को साक्षात परब्रह्म बताते हैं

महाराज जी बताते हैं कि धर्मग्रंथों में गुरु को ब्रह्म रूप माना गया है—

गुरु ब्रह्मा – सृष्टि का ज्ञान देने वाले

गुरु विष्णु – पालन करने वाले

गुरु महेश्वर – अज्ञान का नाश करने वाले

गुरु साक्षात परब्रह्म – पूर्ण तत्त्व, पूर्ण सत्य


इसीलिए कहा गया:

“गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः,
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।”

गुरु केवल मनुष्य शरीर धारण करते हैं, लेकिन उनका वास्तविक स्वरूप त्रिगुणातीत, पूर्ण शांत, चैतन्य और ब्रह्मरूप होता है।


गुरु को भगवान मानना कठिन क्यों लगता है?

Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj बताते हैं कि हमें मूर्ति में भगवान देखना आसान लगता है, लेकिन गुरु में भगवान देखना कठिन—

क्योंकि गुरु मनुष्य शरीर में होते हैं

मानव जैसी चेष्टाएँ करते हैं

सामान्य जीवन जीते दिखाई देते हैं

परंतु साधक जिस दिन गुरु में परमात्मा का अनुभव कर लेता है, उसी दिन उसका आत्मिक जन्म हो जाता है।
ऐसा साधक जीते-जी मुक्त हो जाता है।


भगवान किसके अधीन हो जाते हैं?

महाराज जी कहते हैं—

जिस भक्त में गुरु के प्रति आदर, समर्पण और भक्ति भगवान से भी अधिक होती है, भगवान उसी भक्त के अधीन हो जाते हैं।

यह मात्र कथन नहीं, एक आध्यात्मिक सत्य है।
गुरु के प्रति अत्यंत प्रेम और श्रद्धा वाला भक्त, भगवान के हृदय में विशेष स्थान प्राप्त करता है।




गुरु में परमात्मा का भाव— भक्ति का सर्वोच्च स्तर

आध्यात्मिकता में कहा गया है कि—

शरण गुरु में

अनुभव भगवान में

और प्राप्ति परमात्मा में होती है


इसलिए यदि साधक गुरु को साक्षात भगवान मानकर सेवा और भक्ति करता है, तो उसे अनन्त फल, अपरिमित शांति और परम कृपा प्राप्त होती है।

क्या गुरु को भगवान मानना गलत है?— बिल्कुल नहीं।

जैसा कि Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj ने स्पष्ट बताया—
गुरु को भगवान मानना ही सबसे श्रेष्ठ भाव है।
गुरु भगवान से अलग नहीं, बल्कि हमारे उद्धार के लिए भगवान का ही रूप हैं।

भगवान नाराज़ नहीं होते—
वे प्रसन्न होते हैं, अपने भक्त के और निकट आ जाते हैं।

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