Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj Satsang : Vrindavan में एक पुलिसकर्मी ने अपनी पत्नी पर मज़ेदार कविता सुनाई, जिस पर Shri Hit Premanand Ji Maharaj हँस पड़े। इस हल्के-फुल्के प्रसंग से प्रेमानंद महाराज ने बड़ा संदेश दिया . यहाँ विडिओ देखें
पुलिसकर्मी ने सुनाई मज़ेदार कविता और प्रेमानंद महाराज हँसी रोक न पाए – एक प्रेरक प्रसंग
भक्ति-भाव से भरे सत्संगों में अक्सर ज्ञान, शांति और आध्यात्मिक आनंद का अनुभव मिलता है। लेकिन कभी-कभी ऐसे अनोखे पल भी सामने आते हैं, जो माहौल को हल्का-फुल्का बना देते हैं। हाल ही में वृंदावन में आयोजित एक सत्संग में ऐसा ही दिलचस्प क्षण देखने को मिला, जब एक पुलिसकर्मी ने अपनी पत्नी को लेकर लिखी एक मज़ेदार कविता सुनाई। कविता इतनी हास्यास्पद थी कि स्वयं प्रेमानंद महाराज भी जोर से हँस पड़े।
सत्संग में गूँजी एक मस्तीभरी कविता
वृंदावन के इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में एक पुलिस कॉन्स्टेबल उपस्थित हुआ। महाराज जी से आशीर्वाद पाने के बाद उसने कहा कि उसने अपनी गृहस्थी और पत्नी की आदतों पर एक हल्की-फुल्की कविता लिखी है जिसे वह महाराज जी के सामने पढ़ना चाहता है।
उसकी कविता रोज-मर्रा की छोटी-छोटी नोकझोंक और मज़ेदार स्थितियों पर आधारित थी। जैसे—
- जब वह पनीर माँगता है तो घर में टिंडा परोसा जाता है।
- जब कहता है थोड़ा चीनी दो, तो पत्नी हलवा ले आती है।
सरल शब्दों में कहें तो कविता हर आम इंसान की घरेलू दिनचर्या से जुड़े हँसी-मज़ाक का प्यारा चित्रण थी।
कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है–
दिन कुछ ऐसे बीत रहे थे, आंखों से पानी आता था
मैं कहता था पनीर बना लो, तो सामने टिंडा आता था.
जब मांगता था मीठा उससे, तो नमकीन मुझको वो दे देती थी.
और पहली तारीख आते ही, सारी तनख्वा ले लेती थी.
फिर समय का ऐसा चक्र चला, उसने टीवी खोला
टीवी में कोई संत दिखे, वो बोली कौन हैं ये?
मैंने कहा, स्वयं प्रभु ही हैं
जिन्हें सुनकर आनंद मिले, ये बाबा प्रेमानंद ही हैं.
फिर तो दिन कुछ ऐसे बदले, बिन बोले दौड़े आती है.
मैं शक्कर मांगता हूं उससे, तो हलवा बना लाती है.
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महाराज जी भी हँसी नहीं रोक पाए
जैसे-जैसे पुलिस कर्मी कविता सुनाता गया, सत्संग का माहौल खुशनुमा हो गया।
प्रेमानंद महाराज इस सहज हास्य से इतने प्रसन्न हुए कि हँसी रोक ही नहीं पाए।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि जब इंसान का मन भक्ति की ओर मुड़ता है—
उसके व्यवहार, बोल-चाल और जीवन का दृष्टिकोण अपने-आप बदलने लगता है।
महाराज जी ने यह भी समझाया कि सनातन संस्कृति में गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिकता का एक महत्त्वपूर्ण आधार माना गया है। पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे का “अर्धांग” बताया गया है और यह संबंध आपसी सम्मान, त्याग और प्रेम पर टिका होता है।
आज की पीढ़ी के लिए एक आवश्यक संदेश
इस हल्के-फुल्के प्रसंग से प्रेमानंद महाराज ने बड़ा संदेश दिया—
कि हम भले ही आधुनिक जीवन जी रहे हों, लेकिन घर-परिवार, रिश्ते, और संस्कार आज भी जीवन का मूल केंद्र हैं।
उन्होंने कहा कि आज समाज में कई लोग इन मूल्यों को भूलते जा रहे हैं, जबकि सुखी जीवन का रहस्य इन्हीं में छिपा है।
एक परिवार जो हँसते-खेलते, प्रेम से, और समझदारी से साथ चलता है—वही वास्तव में संपन्न कहलाता है।
सत्संग का हल्का पल, लेकिन गहरा अर्थ
यह छोटा-सा हास्यपूर्ण क्षण सिर्फ मनोरंजन नहीं था।
इसने यह याद दिला दिया कि:
- भक्ति का मार्ग कठिन नहीं—सरल हृदय से शुरू होता है।
- घर-परिवार में हँसी और अपनापन भी आध्यात्मिकता का हिस्सा है।
- गुरु का सान्निध्य केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि जीवन को हल्का और सहज भी बनाता है।
ऐसे प्रसंग बताते हैं कि अध्यात्म सिर्फ मंदिर या ग्रंथों तक सीमित नहीं—
यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों और मुस्कान में भी बसता है।

